KNOWLEDGE :- लाहौर जीतकर महाराजा रणजीत सिंह औरंगजेब की बनाई मस्जिद क्यों पहुंचे ?

KNOWLEDGE :- लाहौर जीतकर महाराजा रणजीत सिंह औरंगजेब की बनाई मस्जिद क्यों पहुंचे ? 


Maharaja Ranjit Singh Birth Anniversary: शेर-ए-पंजाब कहे जाने वाले महाराजा रणजीत सिंह ने हमेशा इंसानियत को सबसे ऊपर रखा. जब लाहौर को जीतने के बाद वो औरंगजेब की बनाई बादशाही मस्जिद पहुंचे तो अनहोनी की आशंका जताई गई, लेकिन हुआ इसके उलट. आइए, महाराजा रणजीत सिंह की जयंती पर जानते हैं, आखिर वे औरंगजेब की बनाई मस्जिद क्यों गए?

भारत के इतिहास में अगर किसी शासक ने धर्म, सत्ता और मानवीयता का अद्भुत संतुलन साधा, तो वह थे महाराजा रणजीत सिंह (1780-1839). उन्हें शेर-ए-पंजाब केवल वीरता के लिए नहीं कहा गया, बल्कि इसलिए क्योंकि उन्होंने उस दौर में इंसानियत को राजनीति से ऊपर रखा. उन्होंने लाहौर पर विजय के बाद बादशाही मस्जिद में प्रवेश किया तो सबके मन में अनहोनी की आशंका थी. यह वही मस्जिद थी जो मुगल सम्राट औरंगज़ेब ने बनवाई थी और जिसके मीनारें कभी इस्लामी सत्ता के प्रतीक के रूप में देखी जाती थीं. लेकिन रणजीत सिंह ने वहां जो किया, उसे देखकर पूरा उपमहाद्वीप चकित रह गया.
आइए, महाराजा रणजीत सिंह की जयंती पर जानते हैं कि आखिर वे औरंगजेब की बनाई मस्जिद क्यों गए? उनकी जिंदगी से जुड़े कुछ और किस्से भी जानेंगे.

लाहौर जीता लेकिन खुद को राजा नहीं घोषित किया

साल 1799 का उल्लेख इतिहासकार खुशवंत सिंह ने अपनी प्रसिद्ध किताब A History of the Sikhs, Volume 1 में बड़े विस्तार से किया है. उन्होंने लिखा है कि लाहौर की जनता स्वयं रणजीत सिंह को आमंत्रित कर रही थी क्योंकि वे एक ऐसे नेता की प्रतीक्षा कर रहे थे जो मजहबी और राजनीतिक उथल-पुथल से उन्हें मुक्ति दिला सके. रणजीत सिंह मात्र 19 वर्ष के थे जब उन्होंने लाहौर की ओर प्रस्थान किया. अफगानों और बंगी मिसल के सरदारों के नियंत्रण में लाहौर अव्यवस्था का केंद्र बन चुका था.

रणजीत सिंह ने बल से नहीं, जन-समर्थन से प्रवेश किया. लोगों ने स्वयं दरवाज़े खोल दिए और उन्होंने लड़ाई के बाद खुद को राजा घोषित करने के बजाय पहले दरबार-ए-आम बुलाया और जनता की सहमति से पद ग्रहण किया.

औरंगज़ेब की मस्जिद और महाराजा की सोच

इतिहासकार सर लेपेल ग्रिफिन अपनी किताब Ranjit Singh: A History of the Sikh Ruler of the Punjab (1892) में लिखते हैं कि लाहौर विजय के बाद रणजीत सिंह ने किसी शत्रु स्मारक को नष्ट नहीं किया. उलटे उन्होंने औरंगज़ेब की बनाई मस्जिद को विशेष सुरक्षा प्रदान की. लाहौर जीतने के बाद रणजीत सिंह, अपने मंत्रियों और फौज के साथ बादशाही मस्जिद में पहुंचे. सैनिकों को लगा कि वह मस्जिद को अपने शासन-प्रतीक में बदल देंगे. पर महाराजा ने ऐसा कुछ नहीं किया. अलबत्ता उन्होंने नमाज़ पढ़ रहे इमाम से भेंट की, उन्हें आदर दिया और आदेश दिया कि मस्जिद में किसी भी प्रकार की राजनीतिक दख़ल नहीं होगी.

इतिहासकार जीन होल्डन (Jean Holt) ने अपनी शोध-पत्रिका The Reign of Ranjit Singh में लिखा है कि उन्होंने मस्जिद के रखरखाव के लिए खजाने से नियमित अनुदान जारी किया और यह स्पष्ट किया कि पंजाब की धरती पर सभी धर्मों के पूजा-स्थल समान रूप से सुरक्षित रहेंगे.

मस्जिद में महाराजा का संदेश

इतिहासकार डॉ. जसवंत सिंह बल ने अपनी शोध कृति Ranjit Singh and His Times में उल्लेख किया है कि जब रणजीत सिंह मस्जिद में पहुंचे, तो उन्होंने सैनिकों से कहा-जो मज़हब दूसरों को इंसाफ़ और अमन सिखाता है, वह हर राजा का भी धर्म होना चाहिए. इस कथन के बाद उन्होंने वहां खड़े इमाम को मस्जिद की चाबियां ही अपने हाथों में रखने को कहा. लाहौर की जनता के लिए यह दृश्य लगभग अविश्वसनीय था. एक सिख सम्राट, जो विजेता के रूप में आया, उसी मस्जिद के प्रति श्रद्धा प्रकट कर रहा था जिसे मुगल साम्राज्य की पहचान माना जाता था.

बादशाही मस्जिद को मेल-मिलाप का प्रतीक बनाया

बादशाही मस्जिद को उन्होंने सत्ता-प्रदर्शन का साधन नहीं, बल्कि मेल-मिलाप का प्रतीक बना दिया. उन्होंने कहा था कि जो दूसरों के धर्मस्थल की रक्षा कर सकता है, वही अपने धर्म का सच्चा सेवक है. यह विचार न केवल उस समय असाधारण था, बल्कि आज के संदर्भ में भी मार्गदर्शक है. जब पूरे उपमहाद्वीप की राजनीति अक्सर धर्म के आधार पर बंटी होती थी, तब रणजीत सिंह इंसानियत की एकता का झंडा उठाए खड़े थे.

महाराजा रणजीत सिंह ने बादशाही मस्जिद मेल-मिलाप का प्रतीक बना दिया.

धर्म नहीं, इंसान सर्वोपरि

रणजीत सिंह ने कभी धर्म के आधार पर शासन नहीं चलाया. उनकी सरकार का चरित्र बहुधर्मी और समरस था. The Punjab: Past and Present नामक जर्नल में उल्लेख मिलता है कि उनके दरबार में मुख्य सेनापति मुसलमान मिसर दीवान चंद, वित्त मंत्री हिंदू दीवान मोहकम चंद और धार्मिक सलाहकार सिख फकीर अज़ीजुद्दीन थे. फकीर अज़ीजुद्दीन (जो मुस्लिम थे) महाराजा के सबसे करीबी सलाहकारों में से एक थे. ग्रिफिन के अनुसार, रणजीत सिंह ने अपने शासन में इस्लामी विद्वानों को भी संरक्षण दिया, और किसी भी धार्मिक अनुयायी को उसके विश्वास से विमुख करने का प्रयास नहीं किया.

कला, स्थापत्य और जनसेवा की नई परिभाषा

महाराजा रणजीत सिंह केवल योद्धा नहीं, एक दूरदर्शी प्रशासक और कला-प्रेमी भी थे. इतिहासकार हरबंस सिंह की किताब The Heritage of the Sikhs के अनुसार उन्होंने लाहौर किले, हरमंदिर साहिब और अनेक मंदिरों-मस्जिदों के जीर्णोद्धार के लिए राजकोष से निधि दी. उनके शासन में किसी धार्मिक ढांचे को नुकसान नहीं हुआ. स्वर्ण मंदिर का सोने का आवरण उन्हीं के कार्यकाल में हुआ था. उन्होंने अमृतसर, लाहौर और मुल्तान जैसे शहरों में चिकित्सालय, अनाज-भंडार और सराय स्थापित कराए.

रणजीत सिंह अपने जीवन में किसी भी समय तानाशाह नहीं बने. प्रसिद्ध इतिहासकार W.G. Osborne ने लिखा है कि रणजीत सिंह अक्सर रातों में भेष बदलकर जनता के बीच जाते ताकि यह जान सकें कि उनके अधिकारियों का आचरण कैसा है. वे जनता की पीड़ा और सुझावों को सीधे सुनते थे. यही कारण था कि वे अपने राज्य में दया और अनुशासन दोनों के प्रतीक माने जाते थे.

धर्म से ऊपर राष्ट्र

रणजीत सिंह ने जिस भारत और पंजाब की परिकल्पना की, वह किसी एक धर्म पर आधारित नहीं थी. उनके शासन में राज धर्म का अर्थ था न्याय, ऐसा न्याय जो जातीय या धार्मिक भेदभाव से परे हो. इतिहासकार की एक और पुस्तक The Sikhs में लिखा है कि रणजीत सिंह ने अपने साम्राज्य को धर्मनिरपेक्ष शासन की नींव पर खड़ा किया, इसलिए उनका राज्य ब्रिटिश राज से पहले भारतीय संघीयता के आदर्श के समान था.

विरासत आज भी जीवित है

महाराजा रणजीत सिंह की विरासत केवल पंजाब के इतिहास तक सीमित नहीं है. उनका शासन इस बात का उदाहरण है कि सत्ता की सबसे बड़ी ताकत उसके संयम में होती है. उन्होंने एक ऐसा उदाहरण स्थापित किया जिसमें तलवार और करुणा साथ चलती हैं. और जहां धर्म विभाजन नहीं, संवाद का सेतु बनता है. उनका लाहौर की बादशाही मस्जिद में जाना केवल एक घटनाक्रम नहीं, बल्कि उस विचार का जीवंत प्रमाण था. वे कहते थे कि विजय वही सच्ची है जिसमें विनम्रता हो.

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