BREAKING NEWS :- भीलवाड़ा नगर निगम चुनाव-भाजपा में भीतरी तनातनी,सामने से हमला हो तो मुकाबला आसान !

BREAKING NEWS - भीलवाड़ा नगर निगम चुनाव-भाजपा में भीतरी तनातनी,सामने से हमला हो तो मुकाबला आसान... !


भीलवाड़ा (अंकुर पारीक)। नगर निकाय चुनाव का बिगुल बजते ही भीलवाड़ा भाजपा में बाहर से ज्यादा भीतर की सियासत तेज हो गई है। नगर निगम की सत्ता हासिल करने की तैयारी में जुटे संगठन के सामने सबसे बड़ी चुनौती विपक्ष नहीं, बल्कि अपने ही खेमों के बीच बढ़ती खींचतान बनती दिखाई दे रही है। पूर्व भाजपा विधायक विट्ठल शंकर अवस्थी और भाजपा समर्थित निर्दलीय विधायक अशोक कोठारी के बीच बढ़ता राजनीतिक तनाव टिकट वितरण से लेकर संगठनात्मक वर्चस्व तक नए सवाल खड़े कर रहा है।

एक तरफ अवस्थी अपने पुराने संगठनात्मक आधार और अनुशासन की राजनीति के साथ मैदान में हैं, तो दूसरी तरफ कोठारी अपने साथ खड़े कार्यकर्ताओं की ताकत दिखाकर टिकट चयन में प्रभाव की दावेदारी पेश कर रहे हैं। ऐसे में भाजपा के लिए असली परीक्षा विपक्ष से मुकाबले की नहीं, बल्कि घर के भीतर के मतभेदों को चुनावी नुकसान में बदलने से रोकने की है।

कोठारी का शक्ति प्रदर्शन, टिकटों पर सीधी नजर

अशोक कोठारी के कार्यकर्ता स्नेह मिलन सम्मेलन ने भाजपा की स्थानीय राजनीति में हलचल बढ़ा दी। कोठारी ने साफ संकेत दिया कि उनके साथ खड़े कार्यकर्ताओं को नजरअंदाज करना आसान नहीं होगा। उन्होंने दावा किया कि उनके साथ जुड़े कार्यकर्ता भाजपा विचारधारा से जुड़े रहे हैं और लंबे समय से उचित राजनीतिक सम्मान की प्रतीक्षा कर रहे हैं।

कोठारी ने टिकट चयन की प्रक्रिया पर नजर रखने की बात कहकर साफ कर दिया कि इस बार नगर निगम चुनाव में उनकी भूमिका केवल समर्थन तक सीमित रहने वाली नहीं है। दो दिन की टिकट प्रक्रिया पर नजर के बाद संघ समर्थित विचार परिवार और कार्यकर्ताओं के साथ बैठक कर आगे की रणनीति तय करने का संकेत भी राजनीतिक हलकों में चर्चा का विषय बना हुआ है।

अवस्थी का पलटवार—अनुशासन बनाम व्यक्तिगत प्रभाव

वहीं तीन बार विधायक रह चुके विट्ठल शंकर अवस्थी ने भी चुनावी मैदान में अपनी सक्रियता बढ़ा दी है। अवस्थी का जोर संगठन, विचारधारा और अनुशासन पर है। उनका संदेश साफ है कि टिकट की दौड़ में वही कार्यकर्ता आगे बढ़ें जो पार्टी के साथ लगातार खड़े रहे हैं।

अवस्थी ने पिछले विधानसभा चुनाव के परिणामों के पीछे घरेलू कारणों को जिम्मेदार बताते हुए भाजपा को भीलवाड़ा का मजबूत राजनीतिक आधार बताया। साथ ही उन्होंने इशारों में उन लोगों पर निशाना साधा जो चुनावी मौसम में पाला बदलते या संगठन के समानांतर अपनी राजनीतिक जमीन तैयार करते नजर आते हैं।

सबसे बड़ा सवाल—लड़ाई टिकट की या वर्चस्व की?

भीलवाड़ा की सियासत में अब सवाल केवल यह नहीं है कि किसे टिकट मिलेगा। बड़ा सवाल यह है कि टिकट बांटने के बाद नाराज दावेदार और उनके समर्थक किसके साथ खड़े होंगे?

यदि पूर्व विधायक और भाजपा समर्थित निर्दलीय विधायक के खेमों की तनातनी टिकट वितरण के बाद और गहरी हुई तो इसका सीधा असर भाजपा के चुनावी समीकरणों पर पड़ सकता है। वार्ड स्तर पर बागी उम्मीदवार, नाराज कार्यकर्ता और भीतरघात की स्थिति संगठन के लिए भारी पड़ सकती है।

चतुर्वेदी की अपील, लेकिन जमीन पर चुनौती बड़ी

भाजपा के वरिष्ठ नेता अरुण चतुर्वेदी ने दोनों पक्षों के बीच मतभेद खत्म कर एकजुट होकर चुनाव लड़ने की उम्मीद जताई है। उन्होंने कहा कि अशोक कोठारी ने निर्दलीय जीतने के बाद बिना शर्त भाजपा सरकार का समर्थन किया है और सभी को मतभेद भुलाकर भाजपा का बोर्ड बनाने के लिए एकजुट होना चाहिए।

लेकिन सवाल यही है कि अपीलों से क्या भीतर की सियासी आग शांत होगी या टिकटों की सूची सामने आते ही असली तस्वीर सामने आएगी?

नगर निगम चुनाव में भाजपा के सामने सबसे बड़ी चुनौती विपक्ष को पछाड़ने से पहले अपने ही खेमों को एक मंच पर रखने की है। क्योंकि चुनावी मैदान में दुश्मन सामने से हमला करे तो मुकाबला आसान होता है, लेकिन जब वार भीतर से हो तो संगठन की पूरी रणनीति ही सवालों के घेरे में आ जाती है।

भीलवाड़ा में इस बार चुनाव सिर्फ वार्डों की लड़ाई नहीं, भाजपा के भीतर प्रभाव, वर्चस्व और राजनीतिक भविष्य की भी बड़ी परीक्षा बनता दिखाई दे रहा है।

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